गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

प्रिय गोसेवक भ्राताओं
जय गोमाता
गोरक्षा कार्य में भाषण, विधि विधान क्षेत्रों में करोडों रूपया दान देकर गोशालाओं का निर्माण और सञ्चालन भारतवर्ष के कोने कोने में देखा जा सकता हैलेकिन हमारा दुर्भाग्य है की यह सभी उपाय कार्य पुरा नही कर पा रहे हैंआज गोरक्षा का सबसे बड़ा दुश्मन आर्थिक कारण हैग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ यह गोवंश आज बेसहाय कहलाता है

रास्ट्रीय स्वयमसेवक संघ के रास्ट्रीय गोरक्षा प्रमुख आज के संत माननीय श्री ओमप्रकाश जी ने एक नया सोच दिया
गाय ग्वाले के घर पर बंधती है और अगर उसे पालने के लिए प्राप्त राशिः गवाले को मिलने लग जाए तो वोह गोवंश को अपनी बहुमूल्य सम्पति की तरह संभाल कर रखेगायह राशिः उसे गोबर और गोमूत्र द्वारा प्राप्त हो सकती हैसाथिओं एक गोवंश प्रतिदिन लगभग १० किलो गोबर और लिटर गोमूत्र प्रदान करता हैपुरे देश के सन्दर्भ में यह लगभग १०० करोड़ टन गोबर और ७० करोड़ किलो लिटर गोमूत्र प्रदान करता है
अगर गोबर रूपये /- प्रति किलो और गोमूत्र रुपया प्रति लिटर खरीदना चालू हो जाए तो प्रति गोवंश ग्वाले को रुपया ५५ प्रति दिन की प्राप्ति हो सकती हैयह दाम उसे कोई उद्योगपत्ति ही कच्चे माल की तरह प्रुक्त कर प्रदान कर सकता है
इस सोच को लेकर माननीय के आदेशानुसार गोवर्धन उद्योग का प्रारम्भ हुआ हैयह मास का शिशु आज लगभग ५००० लिटर गोमूत्र और लगभग ५००० किलो सुखा गोबर (कंडे ) प्रतिदिन खरीदने की क्षमता विकसित कर चुका हैआज हम शुद्ध प्राकृतिक फिनायल, कीमती हेंडवाश, गोजल अर्क, धुप, हस्त प्रक्षालन मुक्त पावडर, समिधा हवं लकड़ी और विशेषत: विश्व में पृथम बार पार्टिकलबोर्ड का उत्पादन कर रहे हैं
हमारे कार्यस्थान पर गोमूत्र हमे रु. -प्रति लिटर और गोशालाओं से खरीद रु/- प्रति लिटर पर की जा रही हैजल्दी ही हम इस दर को और बढ़ा सकें, ऐसी हमारी कामना है।

प्रिय गोशाला में मेरे साथिओं, ब्रजमंडल की लाखों गायों की रक्षा का भार आप महानुभावो ने अपने कंधो पर उठा रखा है। 'गोवर्धन ' आपके इस सरहानीय प्रयास का सहयोगी है और प्रतिदिन लगभग रु. १५-२०,००० गोमूत्र और रु. १०,०००/- सूखे गोबर के खरीदी के माध्यम से विभिन्न गोशालाओं के नित्य प्रति के व्यय में एक लघु सहयोग देने का प्रयास कर रहा है
आप को गोमूत्र के संग्रह के सुचारू स्वास्थ्य व्यवस्था करनी है जैसे गोघर को नित्य धुलवाना, फर्श पक्का करना
और गुमुत्र नाली में जाए ऐसी व्यवस्था करनाके सामने हौदी बनाना जिसमे गोमूत्र संग्रह होसकेइन होदिओं से मोटे कपडे से छान कर ड्रम में भर कर आप हमे दे सकते हैं
ड्रम भेजने और भरने के पश्चात उठाने के जिम्मेदारी हम वहन कर सकते है
आप को और कोई जानकारी इस विषय में चाहिए तो निशंकोच ९४८१०८८३००३ पर मेरे से ले सकते हैं
गोवर्धन द्वारा उत्पादित पूर्ण सुरक्षित प्राकृतिक वस्तुओं का विक्रय आप अपने स्थानों पर प्रारम्भ कर बिक्री का लगभग चौथाई भाग अपनी गोशाला के कार्यों में उपयोग कर सकते हैं
हमारा उद्देश्य गोरक्षा हम सभी मिल कर पुरा करें ऐसी मेरी प्रभु गोवर्धन से प्रार्थना है
गोसेवा में रत आपका साथी
डॉ श्री कृषण मित्तल
अध्यक्ष गोवर्धन उद्योग
दक्षिण भारत प्रभारी एवम रास्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य
भा जा पा गोवंश विकाश प्रोकोस्ट
अध्यक्ष :कर्नाटक गोशाला महासंघ
सदस्य और कर्नाटक केरल समिति प्रभारी
भारतीय जीव जन्तु कल्याण बोर्ड
सदस्य केरल राज्य जीव जंतु कल्याण बोर्ड

रविवार, 21 जून 2009

गोवर्धन udyog














कसयिखाना क्यों नही चाहिए -एक वीवेचन

देश में एक बडा सवाल है की कसाईखाना होना चाहिए या नही
अगर हाँ तो कहाँ, कितना बड़ा कोन चलाये ?
क्या यह सेवा है या उद्योग और व्यापार है?
छेत्र की कीतनी जरुरत है ?
उस छेत्र में जानवरों की कितनी संख्या है?
जनता क्या चाहती है ? वीधी वीधान क्या नीर्देश दे रहे हैं ?

इन सब का जवाब खोज कर निम्नलिखीत पत्र त्यार किया गया जो हर छेत्र और संदर्भ में मार्ग दर्शन करसकता है?


डॉ. मीतल का गोवंश आधारित उद्योग सेमिनार में भाषण

गाय गाँव गोशाला स्वालंबन


बैल शक्ती- आर्थीक उत्थान का माध्यम


















































गोवंस व् उद्दोग के मध्यम से गोवंश रक्षा, सम्वर्धन व् वीकाश

गोवंश आधारीत उद्योगों द्वारा गोवंश सम्वर्धन गौरक्छा, ग्राम, स्त्रिश्क्ती, युवाशक्ति का वीकाश -हमारा संकल्प देश में उपलब्ध १०० करोड़ तन गोबर तथा ७० करोड़ कीलोलीटर गोमूत्र द्वारा देश की अर्थव्यवस्था में रु . २० लाख करोड़ वार्षीक का योगदान




गोवर्धन उद्योग के बढ़ते कदम मथुरा से प्रारम्भ हो मैसूर में भी स्थापित हो रहे है हम

प्राणी बली - क्या वैधानिक है -क्या सही है

रविवार, 31 मई 2009

गोवंश शक्ती

गौरक्षा के आयाम में आर्थीक स्वालंबन एक महत्व पूर्ण कड़ी है गोवंश को बेसहारा प्रश्रीत और भर कर कसाई को बेच दीया जाता है, यह नीर्वाद सत्य है की गोवंश का ग्रामीण अर्थ व्यवस्था के साथ पुरातन नाता है इसे कामधेनु, नंदी, वर्षभ नाम से स्मरण किया गया है। ग्राम अर्थ व्यवस्था की मुख्य कड़ी यह आज पूर्ण अहीन्सक, गौभक्त समाज को पुकार रहा है और याद दीला रहा है की प्रुकृती की यह आज भी देश के स्वास्थ्य, रोजगार और अर्थ व्यवस्था को बडा सहयोग दे सकती है अगर इस की शक्ती और गोमी को पूर्ण रूप से उपयोग में लाया जाए तो करोडों बेरोजगारों को रोजगार, शुद्ध प्राकृतीक उत्पाद ग्राम से शहर की और पलायन की रोक, देश की वीद्युत व् इंधन का साधन, देश की अर्थ व्यवस्था में लाखों करोड़ का वार्षीक योगदान देने में स्क्छ्म है।

देश का गोभक्त आज उपरोक्त सचाई को स्वीकार कर चुका है पुरेi देश में गोवंश की चर्चा है लेकीन क्या उत्पादन करे, कैसे करे, किस तकनीक का उपयोग करे, क्या लागत आएगी, उत्पाद कहाँ बेचे जायें तथा बाज़ार में उत्पादों से स्पर्धा कैसे की जाए आदी की खोज में है इन सभी प्रश्नों का उत्तर देने के लीये सीक्षण व्र्ग एक आवश्यकता है।

आईये इस वीश्य पर चर्चा करते हैं

प्रथम प्रश्न गोपालक के यहाँ से उद्योग तक आपूर्ती का आता है, वैसे तो जहाँ यह कुटीर उद्योग लगें वहां गोवंश पाया जाएगा और बाज़ार भी वहीं का होगा ऐसा माना जाना चाहिए।
उद्योगों को लागत के आधार पर बाँटने से कार्य और सरल होगा आदी आवश्यकताएं और इनके लीये पूंजी की जरूरत होती है।

गोवंश आधारीत उत्पाद रु.२५,००० - २,50,०००,/- , २,५०,००० -25,००,०००/- ,25,००,००० से ज्यादा लागत श्रेणी में विभाजीत कीये जा सकते है।
i
१) हमे चाहिये
गोपालक से लेकर मध्य कार्य उद्योग तक पहुचने वाले व्यापारी
२) मध्य कार्य उद्योग यानी उत्पादक को गोबर,गोबर पावडर, गोबर रेशा,वशापीकृत,
प्रिसकरत
गोमूत्र के उद्योग
३)विभन्न उत्पाद नीर्माता
४) विक्रय के लीये बाज़ार और व्यापारी